मुजफ्फरपुर   के  रामबाग     इलाके  में स्थित आंगनवाडी सेंटर पहुंचना बारिश में और ज्यादा  मुश्किल हो जाता  है/लगातार  ३ दिन  चली  मूसलाधार  बारिश  ने  सारे मुजफ्फरपुर का हाल वैसे भी बदल दिया था /  हर तरफ कचरा पानी के साथ बहता दिखाई दे  रहा था/अधबने  दुर्गा पूजा  पंडाल भी सड़क रोके  खड़े  दिखाई  दिए   /ऐसे में मैं  वैजन्ती कुमारी  से मिलना चाहती थी / वैजन्ती तक पहुंचना सड़क पर पानी से चले संघर्ष के बाद एक बड़ी जंग जीतने सा था/.करीब ४५ मिनट के सफ़र के बाद जब मैं वैजन्ती के पास पहुंची तो उसे पहली बार देखकर ऐसा लगा मानो दुर्गा खुद कुछ समय पहले ही मिलने चली आई हों.लाल साडी,लाल बिंदी,लाल महीन मोतियों वाला मंगल सूत्र ,लाल पीली चूड़ियाँ और चेहरे पर संतोषी मुस्कान.दोनों हाथ जोड़कर अभिनन्दन करने वाली ये महिला जो मेरे सामने खड़ी थी,इसे ही लोग रामबाग में वैजन्ती दीदी कहते हैं/तीन बच्चों की माँ वैजन्ती ,दरअसल रामबाग स्थित आँगन वाडी कार्यकर्ता है ,थोड़ी देर संकोच में धीरे धीरे बातचीत जारी रखने के बाद वैजन्ती ने खुलना शुरू किया.   उसे अपने सेंटर से जुडी हर संख्या उंगली पर याद है. ...३ किशोरियां,८ धात्री  माताएं,४० स्कूल पूर्व बच्चे,४० पोषण आहार के लिए आने वाले बच्चे......उनकी हर बात वैजन्ती जानती है/
.वो खुश है की सुबह ९ से दोपहर १ तक वो जिस काम में लगी है उसे पूरी ईमानदारी  से पूरा कर रही है/.डोम पट्टी में रहने वाले बच्चों का उसकी आंगनवाडी में आने और जुड़ जाने की घटना बताते हुए  उसका  गर्व उसकी आवाज़ में सुनाई देने लगता है/वो बताती है की कैसे  वो उन् परिवारों को मनाती   है  जिन्हें इस बात की गारंटी  चाहिए होती है कि उनके बच्चे को किसी हरिजन बच्चे क साथ नहीं बैठाया  जायेगा/"
वैजन्ती के लिए बड़ी चुनौती है उसके क्षेत्र  के कचरा बीनने  वाले परिवार जो अब भी बच्चों को स्कूल भेजने  की बजाय कचरे के ढेर के पास भेजना ज्यादा उपयोगी मानते हैं."हम बोले आप बच्चा की कमाई खाइएगा या खुद कमा कर उसका पेट भारियेगा? २-३ दिन  बात समझता है और फिर बच्चा लोगों को काम पर लगा देता है." साफ़ सफाई के प्रति वैजन्ती सख्त दिखाई दी.उसने अपनी सहायिका को भी हिदायत दी हुई है की आंगनवाडी में आने वाले हर बच्चे का वो हाथ  ,चेहरा  और पैर वो साफ़ करा कर ही उसे बैठाएगी/"टीकाकरण के दिन आप कभी भी यहाँ आ जाइये आपको एक भी बच्चा गन्दा नहीं दिखाई देगा",ये वैजन्ती का दावा है.वो परेशान है की इतने गरीब परिवारों से आने वाले बच्चों को एक बजे बाद रात तक कई बार कुछ खाने को नहीं मिलता तो पोषण की देख रेख ठीक तरह से कैसे हो पायेगी.जब वो कहती  है कि 'अगर टीकाकरण वाले  दिन माँ व्यस्त हो तो अब पिता लोग भी बच्चा लेकर आ जाता है...सुधर न रहा है!' तब उसकी आवाज़ और आँखों में एक अलग ही चटक अभिव्यक्ति अनुभव कि जा सकती है.निश्चित रूप से वैजन्ती बहुत ख़ूबसूरती से वो कर रही है जो हर एक अच्छे आंगनवाडी वर्कर  से अपेक्षित  है/
"दुबली पतली सांवली लड़की,गज़ब के आत्मविश्वास से भरपूर...कंधे पर एक झोला.....उस झोले में पूरी दुनिया.खानाबदोश सा जीवन ,आँखों में एक अजब से प्रतिशोध की ज्वाला ." ये वो तस्वीर है जो मैंने देखी थी २ महीने पहले.दरअसल इस लड़की  को सामने से तो अब तक नहीं देख पायी हूँ पर इस  से रूबरू होनेवाले मेरे साथी अक्लाख ने ऐसा शब्द चित्र  खींचा की मैं इससे बात करने को बेचैन हो गयी.करीब २-३ दिन के प्रयास के बाद आखिर उसका नंबर भी मिल ही गया.फ़ोन नंबर मिलते ही बेचैनी और बढ़ गयी ..मुझे खुद से डर लग रहा था कि उसका दबंग रवैया मुझे चारों खाने चित न कर दे.कहीं उसका कोई उत्तर ऐसा न हो कि मेरे हाथ पाँव फूल जाएँ.सच कहूं तो मैं उसकी सच्चाई और बेबाकपन से डर रही थी.मैं डर रही थी उस एक महिला से जिसमे दुर्गा का शायद रूप है...वो रूप भी ऐसा कि गाँवों कि महिलाएं और कॉलेज की युवतियां अपने नाम के आगे अब उसका नाम लगाने लगी हैं.शायद कहीं ये नाम मुजफ्फरपुर,वैशाली और समस्तीपुर के आसपास के गाँवों की महिलाओं को सुरक्षा और आत्मबल प्रदान करता है.
 
बेचैनी ख़त्म करने का एक ही जरिया था...डर को ताक पर रख के फ़ोन पर बातचीत/फ़ोन लगा...दूसरी ओर से एक महीन आवाज़ आई...मैंने तुरंत पूछा....भारती जी बोल रही हैं?जवाब आया ...हां/मैंने कहा...आपसे थोड़ी बात करनी है.......वो बोली....मजदूर दिवस की तैय्यारियों में व्यस्त हूँ पर फिर भी बात तो करुँगी...आप १० मिनट में फ़ोन लगाइए./आवाज़ बहुत जानी पहचानी लगी.ऐसा लगा मानो...मुजफ्फरपुर की कोई आम लड़की ने फ़ोन उठाया हो/पर ये लड़की"भारती कुशवाहा"आम नहीं कुछ ख़ास है ये भी मैं जानती थी.एक बलात्कार के साक्षी के तौर पर टिके रहना...गवाही देते रहना.. हर  आम लड़की के बस की बात नहीं.फिर गुंडों द्वारा डराए जाने पर पति समेत अपना गाँव छोड़ना ,शहर छोड़ा ...आगरा में एक नयी दुनिया बसाई....दो बच्चों के भरण पोषण के लिए पति को वहीँ छोड़ कर वापिस मुजफ्फरपुर लौटी तो इस बार ज़मींदार परिवार की इस लड़की को दलितों की बस्ती में शरण मिली.बस्ती की लडकियां स्कूल के रास्ते में पड़ने वाले शराब के ठेकों के बाहर बैठे अधेढ़ उमरी नशेड़ियों और शराबियों से परेशान थी .....भारती ने लड़कियों को गोलबंद किया और पहुँच गयी ठेके पर...पहले पहल विनम्र निवेदन कर के ठेके के मालिक से ठेका बंद करने को कहा और फिर न मानने पर ठेके पर धावा बोलकर हमेशा के लिए ठेका ख़त्म कर दिया.इसके बाद तो जैसे शोषण और प्रताड़ना से पीड़ित लडकियां भारती के समूह में जुडती चली गयी.आज की तारीख में मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाके में धन्धेबाज़ भारती के नाम से कांपते हैं,करीब दो हज़ार महिलाओं का समूह भारती के साथ जुड़  चुका है....ये न सिर्फ अब न्याय के लिए लड़  रहे हैं बल्कि,गाँवों में बच्चों की पढाई और पढाई के लिए ज़रूरी अधोसंरचना के लिए भी कार्यरत हैं.
 
खैर ...दस मिनट बाद मैंने उससे पूछा कि कहाँ रहती हो आजकल?जवाब मिला......भैया दीदी लोग जहाँ जिस गाँव में रुकवा दें वहां/फिर पूछा सामान? जवाब मिला......है न एक "झोला."...२ जोड़ी कपडे,एक कॉपी,पेन,गोंद....और क्या चाहिए? बच्चे....?जब ये पूछा तो बोली......१५ दिन पहले मिली थी.
वो पति जिसके साथ दुनिया बसाई.....?...कुछ रूककर बोली......सुना है दिल्ली में हैं..और दूसरी शादी कर चुके हैं?
मैंने पूछा...डर नहीं लगता ...२७ साल कि उम्र में इतने दुश्मन बनाकर?जवाब आया...."जब तक डरती थी..सबने डराया....अब नहीं डरती हूँ तो लोग मुझसे डरते हैं?
कई बार लोग तुम्हें नक्सली कहते हैं?...वो बोली अगर एक भी सुराग मिल जाए तब बात कीजिएगा.
मैंने पूछा अगर कभी कोई कारण तुम्हें जेल ले जाया जाए तो?
जवाब मिला...हम अहिंसक आन्दोलन करते हैं...प्रशासन को जगाते हैं....न्याय कि गुहार लगाते हैं.इसलिए   ऐसा होगा नहीं..और अगर हो ही जाए तो बाहर ही कौन सा सुखी हैं?
मैंने कहा गाने सुनती हो?उसने कहा...गाती भी हूँ...और फिर बेधड़क गाने लगी.
वो दिल्ली आना चाहती है....सियासी टिकट के लिए नहीं.....अपने पति से एक बार मिलने भर को.उसे रेडियो सुनने कि चाह है...चाहती है कि लोग कोई उससे सिर्फ भारती भी बुलाये.....भारती दीदी या भारती जी नहीं.यकीनन इस लड़की में कुछ तो है......तीन बार धंधेबाजों और गुंडा तत्वों ने इसे मौत के मुहं  तक पहुँचाया और ये हर बार उठी दुगने जोश के साथ.जग अभी जीता नहीं....ये कभी हारी नहीं.मुजफ्फरपुर में अपने आप में अब एक आन्दोलन है "भारती"/१ घंटे और ११ मिनट की बातचीत में "भारती" की कई बातों ने मुझे झक झोरा...कई ने सिखाया,और कई चित्त कर गयीं.सही गलत से परे ये आज एक बहुत बड़ा सच है की भारती करीब २००० महिलाओं को बल देने वाली शक्ति का नाम है.




 
 कई दिनों बाद आज एक बार ऐसा लगा मानो बचपन में माँ से सुनी कहानियों की बूढी पर खूबसूरत परी जिसे माँ  परियों की नानी कहा करती थी ,वो खुद चलकर मिलने आई हो.
चांदी से सफ़ेद बाल,आँखों में चमक और बातों में खूब सा स्नेह.८४ वर्षीय कामिनी कौशल को देखकर मेरी पहली प्रतिक्रिया बिलकुल ये ही थी.अपने समय की मशहूर अदाकार रहीं कामिनी से बातचीत की शुरुआत में ही मुझे समझ आने लगा था की क्यूँ दिलीप कुमार साहब भी अपनी आत्मकथा में इनसे पहली ही नज़र में आकर्षित होने की बात लिखने से नहीं चूके.१९४६ में नीचा नगर नामक फिल्म से अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू करने वाली कामिनी,जिसने बाद में शहीद और शबनम जैसी हिट फिल्म्स दी और फिर लक्स का पहला खूबसूरत चेहरा भी चुनी गयीं,अब बहुत आगे निकल आई हैं.१९४६ में नीचा नगर में काम करने के एक साल भीतर शादी की,पति के साथ मुंबई आयीं और फिर करियर आगे बढाया/१९६५ तक मुख्य भूमिकाओं के बाद चरित्र अभिनेत्री के तौर पर पारी शुरू करते हुए १९८०तक  लगातार फिल्में करने क बाद,अब वो बच्चों के लिए कहानी लिखती हैं,कठपुतलियां बनाती हैं और फिल्में भी.
अभी लखनऊ में हुई मुलाक़ात में एक खूबसूरत गुडिया और दो अपने ही हाथ से बनाये पुतले दिखाए,आँखों में इतनी चमक थी जैसे अभी बहुत कुछ करना बाकी हो.मीडिया से लगातार ३ घंटे मिलने के बाद बोलीं "थोडा आराम कर लूं...अब गला भी साथ नहीं दे रहा".वाक्य में निवेदन का स्वर मुखर था,पर पानी पीकर और २० मिनट सुस्ता कर जैसे वो फिर १९४६ वाली कामिनी कौशल हो गयीं,उठकर बोलीं...."कहिये कहाँ चलना है?"
इस अदाकारा से उनकी उम्र के इस पड़ाव में मिलना मेरे लिए बिलकुल परियों की कहानी को जीने जैसा था.
खैर,जो भी हो ये मुलाक़ात यादगार है.